सुननी-ह डर भागे लागल
सरसुविधा गावे आवे लागल
कबसे इ नेतवन अब खुदके..
धर्तिपुत्र बतावे लागल ।
फागुनके जाडा इ आपन..
रङ रुप देखावे लागल
सोच सोचमे बुझनी ना हम..
चाल-लोगनके समझावे लागल ।
जस ठण्डीके ना चोट लउके..
ना दोदरा खुन निसानीके
ठिक ओसही लोगवा घात देवे..
उठे खुन-खौल जवानीके ।
मन सगरी इ अझुराइल बा
आज लोगवन कहा बिराइल बा
खुद आपनके ना बात करे..
आज अनकर झागरा फरिआइल बा ।
रजनिश कुमार साह



